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Home विशेष अभिषेक उपाध्याय: जाति के नाम पर योगी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश
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अभिषेक उपाध्याय: जाति के नाम पर योगी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सूबे के कई कद्दावर नेताओं मुलायम सिंह यादव, मायावती और अखिलेश यादव को पीछे छोड़ते हुए रिकॉर्ड बनाया है। वह प्रदेश में सबसे लंबे समय तक लगातार कार्यकाल संभालने वाले मुख्यमंत्री बन गए हैं। सीएम योगी ने अपने कार्यकाल में कानून व्यवस्था को दुरस्त किया है, अपराधियों के खिलाफ उनका ‘बुलडोजर’ एक मॉडल बन गया। इसके साथ ही उन पर ‘ठाकुरवाद’ का आरोप भी लगता है। इसी क्रम में एक पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने योगी सरकार में अलग अलग विभागों में कार्यरत लोगों की सूची जारी की है। अभिषेक ने आरोप लगाया है कि योगी सरकार में ‘ठाकुरों’ का राज हैं, एक जाति विशेष के लोगों को जिम्मेदारियां सौंपी गयी हैं।

अभिषेक उपाध्याय ने एक्स पर अपनी पोस्ट में राजपूत-ठाकुर संबोधित सरनेम ‘सिंह, रावत, चौहान, बघेल’ वाले अधिकारियों की सूची जारी करते हुए लिखा, ‘यादव राज बनाम ठाकुर राज!! देश की सबसे बड़ी राजनीतिक स्टोरी जो रिपोर्ट नही हो रही है!!! चूंकि अखिलेश यादव के दौर में मीडिया ने “यादव राज” का जमकर विश्वेषण किया है और खबरें चलाई हैं इसलिए अब योगी आदित्यनाथ के दौर में “ठाकुर राज” पर भी चर्चा ज़रूरी है। “ठाकुर राज” या फिर “सिंह राज”!! “सिंह राज” मैें इसलिए लिख रहा हू्ं कि ऐसे कई अधिकारी जो ठाकुर नही हैं पर उनका सरनेम सिंह है, वे भी इसी राज के ज़बरदस्त लाभार्थी बताए जा रहे हैं। सवाल वहां भी उठा था, सवाल यहां भी उठा है। वहां जब सवाल उठा तो जमकर चर्चा हुई। पर जब यहां सवाल उठ रहा है तो एक रहस्यमय सी खामोशी छाई है जो लोकतंत्र के लिए ठीक नही है। वैसे भी तर्कशास्त्र के जनक अरस्तू ने कहा है कि तर्क अत्यधिक संदेह को खारिज करता है। सो अरस्तू की विरासत को सम्मान देते हुए आइए यूपी के पॉवर स्ट्रक्चर का विश्लेषण शुरू करते हैं जिसमें सीएम सेक्रेटैरिएट से लेकर गृह और पीडब्ल्यूडी जैसे बेहद अहम महकमे भी शामिल हैं।………….’

अभिषेक उपाध्याय के पोस्ट पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लिखा, ‘‘कठपुतली-पत्रकारिता’ के इस दौर में भी जो पत्रकार सत्य की स्वतंत्र खोज़ और उसके प्रकाशन का कार्य कर रहे हैं, वे सच्ची प्रशंसा के हक़दार हैं।’

फैक्ट चेक

उत्तर प्रदेश में कुल 75 ज़िले हैं। इन ज़िलों को प्रशासनिक सुविधा के लिए 18 मंडलों में बांटा गया है। इस तरह 75 डीएम और 18 मंडलायुक्त हैं यानि कुल 93 अधिकारी पद संभाल रहे हैं। अभिषेक उपाध्याय ने अपनी सूची में मात्र 24 सिंह-चौहान उपनाम वाले अधिकारियों का जिक्र किया है हालाँकि हमारी पड़ताल में पता चलता है कि यह सभी ‘क्षत्रिय-राजपूत-ठाकुर’ नहीं हैं।

अभिषेक उपाध्याय की सूची में एक नाम लखीमपुर की डीएम दुर्गाशक्ति नागपाल का है। दुर्गाशक्ति नागपाल जाति से ठाकुर नहीं हैं लेकिन अभिषेक ने उनका जिक्र बस इसीलिए किया क्योंकि उनकी शादी अभिषेक सिंह से हुई है। हैरानी की बात है कि जिस अधिकारी के उसके सख्त फैसलों की वजह से जाना जाता है, पत्रकार अभिषेक उपाध्याय उस महिला को उसकी अपनी योग्यता की बजाए उसे उसके पति की जाति की वजह से तैनात बता रहे हैं।

अभिषेक की सूची में जिला और मंडल संभाल रहे 24 आईएएस अधिकारियों में 9 ठाकुर नहीं हैं। अभिषेक को 98 अधिकारियों में मात्र 14 ठाकुर ही मिले। अभिषेक ने अपनी पोस्ट में लिखा, ‘ठाकुर राज’ या फिर ‘सिंह राज’!! ‘सिंह राज’ मैें इसलिए लिख रहा हू्ं कि ऐसे कई अधिकारी जो ठाकुर नही हैं पर उनका सरनेम सिंह है, वे भी इसी राज के जबरदस्त लाभार्थी बताए जा रहे हैं।’

हैरानी की बात है कि जब अभिषेक उपाध्याय ‘सिंह’ उपनाम को लेकर भ्रमित हैं तो इन्हें ठाकुर सूची में क्यों डाला? अभिषेक उपाध्याय एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, बीते करीबन 21 वर्षों से पत्रकारिता कर रहे हैं। कई मीडिया संस्थानों में शीर्ष पदों पर काम किया है। किताबें लिखे चुके हैं, विदेशों में भी रिपोर्टिंग की है। रामनाथ गोयनका समेत कई अवार्ड हासिल कर चुके हैं। इसके बावजूद उन्होंने ‘सिंह’ उपनाम को लेकर कोई पड़ताल नहीं की या जानबूझकर किसी के राजनैतिक स्वार्थों को पूरा करने के लिए इन्हें ठाकुर जाति में शामिल किया?

अभिषेक उपाध्याय ने एक सूची में योगी आदित्यनाथ की सरकार में चीफ सेक्रेटरी, ओएसडी टू सीएम, मीडिया सलाहकार, सूचना निदेशक, ओएसडी के नाम दिए। इसमें सिंह, चौहान जैसे उपनाम वाले 15 लोगों को शामिल किया गया लेकिन पड़ताल में पता चलता है कि ओएसडी टू सीएम संजीव सिंह ठाकुर नहीं हैं। साल 2012 बैच के संजीव ओबीसी वर्ग से हैं। इसी तरह अभिषेक ने डीजी विजिलेंस राजीव कृष्ण को ठाकुरों की सूची में बस इसीलिए डाल दिया क्योंकि उनकी शादी सरोजनी नगर विधायक राजेश्वर सिंह से हुई है। साथ ही अभिषेक ने यह नहीं बताया कि इससे ज्यादा पद दूसरी जाति के लोग संभाल रहे हैं।

मूलरूप से बिहार के सीतामढ़ी निवासी आईएएस संजय प्रसाद प्रदेश सरकार में प्रमुख सचिव हैं। वो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सबसे विश्वसनीय अधिकारी हैं। इसी तरह एस.पी. गोयल, कुमार हर्ष, शशांक त्रिपाठी, आशुतोष मोहन अग्निहोत्री, विपिन कुमार जैन, बृजेश कुमार, प्रखर वर्मा, अजय कुमार ओझा, अरविंद मोहन, भास्कर चंद्र कांडपाल, आनंद कौशिक, विकास सखाराम बेहेरे, अंजना त्रिपाठी, शालिनी सक्सेना, अभिनव कुमार चौरसिया. धीरज त्रिपाठी, राज कुमार तिवारी, अखिलेश कुमार अवस्थी, अनुराग सिन्हा, राम जियावन चौधरी, राम प्रकाश, प्रदीप कुमार, संतोष कुमार तिवारी, प्रदीप कुमार 2, विनोद शर्मा, शूर्य प्रकाश पाण्डेय, राजेश कुमार विश्वकर्मा, विपुल पांडे, ओम प्रकाश त्रिपाठी, संजय चतुर्वेदी, दिनेश कुमार गुप्ता, प्रभात शुक्ला, अंशुमान राम त्रिपाठीसचिव, विशेष सचिव, ओएसडी जैसे पदों पर हैं।

इन नामों पर गौर करने पर पता चलता है कि इस सूची में ठाकुरों के मुकाबले ब्राह्मणों की संख्या ज्यादा है। ऐसे में तो अभिषेक उपाध्याय को योगी आदित्यनाथ पर ‘ब्राह्मणराज’ का आरोप लगाना चाहिए? लेकिन अभिषेक ने यहाँ होशियारी दिखाते हुए इसका जिक्र नहीं किया। क्योंकि ‘ब्राह्मणराज’ बताना सीएम योगी की प्रशंसा में गिना जाता। दरअसल योगी उस गोरक्ष पीठ का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे दिग्विजयनाथ के समय से ठाकुरों की पीठ कहा जाता है। योगी पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगता है। सपा नेता अखिलेश यादव भी ऐसे मौके का फायदा उठाने से नहीं चूँकते हैं। तो क्या यह माना जाए कि ‘ब्राह्मण विरोधी’ नैरेटिव कहीं ध्वस्त न हो जाए इसीलिए अभिषेक ने इसका जिक्र नहीं किया?

अभिषेक उपाध्याय की एक सूची में यूपी एसटीएफ में सिंह, शाही उपनाम वाले 10 पुलिस अधिकारियों का जिक्र है। अभिषेक ने ठाकुर होने की वजह से एडीजी अमिताभ यश का जिक्र तो किया लेकिन यह बताना भूल गए कि एसटीएफ के टॉप तीन ऑफिसर में दो ऑफिसर कुलदीप नारायण याद और घुले सुशील चन्द्र ओबीसी वर्ग से हैं।

अभिषेक उपाध्याय ने अपने पोस्ट की एक सूची में यूपी के पुलिस कमिश्नर, एडीजी जोन, एसएसपी-एसपी नामों का जिक्र किया है। इस सूची में 16 ‘सिंह’ उपनाम वाले पुलिस अधिकारी हैं। हालांकि यहाँ भी अभिषेक ने होशियारी दिखाई है। इस सूची में सिंह उपनाम वाले मुज्जफरनगर एसएसपी अभिषेक सिंह ठाकुर नहीं हैं। यूपी में कुल 8 जोन, 7 पुलिस कमिश्नर, 68 एसएसपी-एसपी हैं। इस तरह इनकी कुल संख्या 83 है। यानि अभिषेक उपाध्याय को 83 मे से मात्र 15 पुलिस अधिकारी ही ठाकुर जाति से मिले हैं।

जबकि योगी सरकार में अगर एससी-एसटी, पिछड़े अधिकारियों की बात की जाए तो आजमगढ़ एसएसपी हेमराज मीणा, अलीगढ डीआईजी प्रभाकर चौधरी, मऊ एसएसपी इलमरान जी., प्रतापगढ़ एसपी अनिल कुमार, चंदौली एसपी आदित्य लाग्हे, सुल्तानपुर एसपी सोमेन बर्मा, कन्नौज एसपी अमित कुमार आनन्द, बस्ती एसपी गोपाल कृष्ण चौधरी, मेरठ एसएसपी विपिन टाडा, खीरी एसएसपी गणेश प्रसाद साहा, मुज्जफरनगर एसएसपी अभिषेक सिंह, प्रयागराज डीसीपी कुलदीप सिंह गुणवात(पुत्र देवकरण मीणा), डीसीपी सिद्दार्थ शंकर मीणा, इटावा एसएसपी संजय कुमार वर्मा, गाजीपुर एसपी ईराज राजा, ललितपुर एसपी मोहम्मद मुस्ताक, महाराजगंज एसपी सुमेंद्र मीणा, शाहजहाँपुर एसपी राजेश एस, मऊ एसएसपी इलमरान जी., बलरामपुर एसपी विकास कुमार, सोनभद्र एसपी अशोक कुमार मीणा समेत कई पुलिस अधिकारी शामिल हैं। यह संख्या अभिषेक की ठाकुर पुलिस अधिकारी से ज्यादा है। इसके अलावा कई पुलिस अधिकारी के जाति वर्ग के सम्बन्ध में इंटरनेट पर जानकारी का आभाव है। अन्य अधिकारी, वैश्य, ब्राह्मण, जाट समेत कई बिरादरी से हैं।

अभिषेक उपाध्याय ने अपनी पोस्ट में सीएम योगी के कार्यकाल को ‘ठाकुर राज’ बताते हुए पूर्व सीएम अखिलेश के ‘यादव राज’ से तुलना की है। आखिर इसमें कितनी सच्चाई है? NBT पर साल 2014 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक बतौर सीएम अखिलेश यादव के कार्यकाल में पीसीएस भर्ती में यूपी में एक खास जाति ‘यादव’ के नाम पर चुन-चुनकर कैंडिडेट्स को इंटरव्यू बोर्ड तक पहुंचाया गया फिर इंटरव्यू में उन पर जमकर नंबर लुटाए गए। पीसीएस के पूरे इम्तिहान और इंटरव्यू में यादव जाति के कैंडिडेट्स ऊपर से नीचे तक छा गए। न्यूज चैनल ‘आजतक’ के स्टिंग ऑपरेशन इस धांधली को बेपर्दा किया गया है। इस स्टिंग में सामने आया है कि यूपीपीसीएस में एक जाति विशेष पर इंटरव्यू और कुछ हद तक लिखित परीक्षा में भी नंबर लुटाए गए। आम तौर पर जहां जनरल कैटिगरी के उम्मीदवारों को इंटरव्यू में 100-110 नंबर मिले हैं वहीं यादव जाति के कैंडिडेट्स को 140 के आसपास नंबर मिले। पिछड़े वर्ग में 86 उम्मीदवारों को चुना गया, जिसमें से 50 यादव जाति के थे।

वहीं जुलाई 2015 की दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में 75 जिलों में 1526 थानों में से 600 थानों में यादव थानेदार हैं। यहां तक कि सूबे के नए डीजीपी भी यादव ही चुने गए। रिपोर्ट में बताया गया है कि ये अपने सीनियर अफसरों को भी कुछ नहीं समझते क्योंकि कोई न कोई कहीं न कहीं से प्रदेश के शीर्ष यादव परिवार से लिंक निकाल ही लेता है।

इसके अलावा इंडिया टीवी की जुलाई 2015 की रिपोर्ट में बताया गया है कि अखिलेश यादव के कार्यकाल में 3 साल में चुने 86 एसडीएम चुने गए, उनमें 56 यादव थे। वहीं यूपी की अखिलेश सरकार ने 2 अप्रैल 2013 को डॉ. अनिल यादव को राज्य लोकसेवा आयोग का अध्यक्ष बनाया। अध्यक्ष बनने से तीन महीने पहले अनिल यादव आयोग के सदस्य के तौर पर काम कर रहे थे लेकिन आयोग में आने से पहले वो मैनपुरी के एक स्कूल के प्रिसिंपल थे। पीएससी अध्यक्ष बनने के लिए जिन 83 लोगों ने आवेदन किया था उसमें 8 आईएएस, 20 से ज्यादा पीसीएस अफसर, 22 प्रोफेसर थे जबकि अनिल यादव का नाम सबसे आखिर यानी 83 नंबर पर था। लेकिन अखिलेश सरकार ने आईएएस, प्रोफेसर की जगह अध्यक्ष की कुर्सी के लिए एक स्कूल प्रिसिंपल अनिल यादव को तरजीह दी।

इंडिया टुडे की मार्च 2013 को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक सपा सरकार में दरोगा भर्ती का नतीजा घोषित किया। इसमें अजय कुमार सिंह यादव को ओबीसी श्रेणी का होने के बावजूद 313.4167 अंक के साथ सामान्य श्रेणी में चयनित हुआ दिखाया गया। हकीकत में सामान्य श्रेणी का कटऑफ 332.9167 अंक था। ऐसी ही अन्य गड़बडिय़ों को लेकर जब अभ्यर्थियों का गुस्सा फूटा तो बोर्ड ने गुपचुप ढंग से अपनी वेबसाइट पर जारी सूचनाओं में फेरबदल कर दिया। अभी तक केवल ओबीसी श्रेणी के अभ्यर्थी रहे अजय कुमार सिंह को बोर्ड ने ‘स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का आश्रित’ (डीएफएफ) के तहत क्षैतिज आरक्षण का लाभार्थी बता दिया। आजमगढ़ की रीता सिंह, सुषमा शुक्ला, लखनऊ की डॉली शुक्ला, प्रेमा पाठक समेत दो सौ से अधिक महिला अभ्यर्थी दो सौ से अधिक अंक पाने के बाद भी अगले चरण के लिए सफल नहीं हुई थीं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में किसी परीक्षा में ‘ठाकुर’ समाज को जबरन पास करवाया गया है? क्या किसी ठाकुर को उसकी जाति की वजह से फायदा पहुँचाया गया है? 93 डीएम-मंडलायुक्त में से मात्र 14 ठाकुर में कोई अधिकारी गलत प्रक्रिया से चुनकर आया है? क्या किसी अयोग्य ‘ठाकुर’ अधिकारी को जिम्मेदारी दी गयी है? सवाल यह भी है कि अगर ठाकुर अधिकारी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाहन ठीक से नहीं कर रहे हैं तो क्या उन पर एक्शन नहीं हो रहा है?

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