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Home अन्य राइट ऑफ करना कर्ज माफी नहीं, एबीपी न्यूज पर पत्रकार दिबांग ने फैलाया झूठ
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राइट ऑफ करना कर्ज माफी नहीं, एबीपी न्यूज पर पत्रकार दिबांग ने फैलाया झूठ

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सोशल मीडिया पर एबीपी न्यूज़ डिबेट का एक वीडियो वायरल है, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार दिबांग दावा कर रहें हैं कि बैंक ने पिछले नौ वर्षों में 14 लाख 56 हज़ार दो सौ चाबीस करोड़ रुपये का कर्ज उद्योगपतियों का माफ कर दिया है। हालाकि हमारी पड़ताल में यह दावा भ्रामक पाया गया।

एबीपी न्यूज के वीडियो को वामपंथी पत्रकार कृष्णा कांत ने लिखा, ‘पिछले 9 सालों में अरबपतियों के 14 लाख 56 हजार 226 करोड़ रुपये माफ कर दिए गए। अंग्रेजी में इसे राइट ऑफ कहते हैं। माफ कहने पर लोग भड़क जाते हैं। राइट ऑफ कहना फैशनेबल है। राइट ऑफ कहने पर इसमें घोटाला, भ्रष्टाचार और लूट की बू नहीं आती। राइट ऑफ किया गया पैसा वापस नहीं आता। प्रकारांतर से यह माफी ही है लेकिन आपको राइट ऑफ कहना है। नेता और अरबपति मिलकर देश लूटते हैं तो अंग्रेजी में उसे राइट ऑफ कहते हैं। मीडिया में इस रेवड़ी वितरण पर कभी हल्ला नहीं मचता। मीडिया आपका ब्रेनवॉश करने में लगा है कि देश लुटाकर आप विराट हिंदू कैसे बनें!’

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फैक्ट चेक

इस दावे की पड़ताल में हमे दैनिक जागरण की अगस्त 2023 को प्रकाशित रिपोर्ट मिली। इस रिपोर्ट का शीर्षक है, “केंद्र ने 9 वर्षों में 14.56 लाख करोड़ के कर्ज को बट्टे खाते में डाला, कुल ऋण में करीब 50 प्रतिशत रकम उद्योगों की”। रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने संसद में बताया कि पिछले नौ वित्त वर्ष के दौरान 14.56 लाख करोड़ रुपये के फंसे कर्जों (एनपीए) को बट्टे खातों में डाला गया है। इसमें बट्टे खातों में डाले गए कुल कर्ज में से बड़े उद्योगों का ऋण 7,40,968 करोड़ रुपये था। वित्त राज्यमंत्री भागवत कराड ने बताया कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) ने अप्रैल, 2014 से मार्च, 2023 तक कारपोरेट कर्ज सहित बट्टे खातों में डाले गए कर्जों में से कुल 2,04,668 करोड़ रुपये की वसूली की है। उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2017-18 में बट्टे खातों में डाले गए कर्ज के मुकाबले ऋण वसूली 1.18 लाख करोड़ रुपये रही है।

Source-Dainik Jagran

द इकनॉमिक टाइम्स ने सात अगस्त को अपनी रिपोर्ट में लिखा, ‘संसद को सोमवार को सूचित किया गया कि 2014-15 से शुरू होने वाले पिछले नौ वित्तीय वर्षों में बैंकों ने 14.56 लाख करोड़ रुपये के बुरे  लोन बट्टे खाते में डाले हैं। कुल 14,56,226 करोड़ रुपये में से बड़े उद्योगों और सेवाओं के बट्टे खाते में डाले गए ऋण 7,40,968 करोड़ रुपये थे।‘ दैनिक जागरण और द इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट कर्ज माफ नहीं, बट्टे खाते शब्द का जिक्र मिलता है।

आगे हम “कर्ज माफ़ी” यानी Waive Off और “बट्टे खाते में कर्ज” यानी Write off के अंतर को समझेंगे।

ज़ी बिजनेस की रिपोर्ट के अनुसार, ‘एनपीए की वसूली न होने पर ऐसे कर्ज को डूबा हुआ मानकर बट्टे खाते में डाल दिया जाता है। इसे Loan Write-Off करना कहते हैं। लोन राइट ऑफ का मतलब कर्ज माफी नहीं होता। बस राइट ऑफ होने के बाद बैलेंस शीट में उस लोन का जिक्र नहीं होता है। हालांकि बैंक की तरफ से उस लोन की वसूल की कार्रवाई जारी रहती है।

ज़ी बिजनेस ने आगे कर्ज माफी यानी waive off को समझाते हुए लिखा, ‘Loan Waiver शब्‍द का इस्‍तेमाल आपने किसानों के मामले में बहुत सुना होगा। Loan Waive Off का मतलब कर्जमाफी से है। Loan Waive Off तब किया जाता है जब कर्ज लेने वाला किसी भी हाल में लोन की राशि चुकाने में असमर्थ हो। ऐसे में उसका लोन पूरी तरह से माफ कर दिया जाता है। साल 2008 में कांग्रेस सरकार ने देशभर के किसानों के 60 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज माफ कर दिए थे। इसके अलावा अक्‍सर चुनाव प्रचार के दौरान तमाम पार्टियां भी आपको लोन वेव ऑफ करने के लुभावने वादे करती नजर आती हैं।

Source-ZEE Business

इसी तरह साल 2022 में राज्यसभा में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे के पिछले पांच वर्षों में बट्टे खाते  में डाली जाने वाली राशि की जानकारी मांगी थी जिसके जवाब में वित्त राज्यमंत्री डॉ. भागवत कराड ने बताया कि पिछले 5 वित्त वर्ष (2017-18 से 2021-22) में 9,91,640 करोड़ रुपये का बैंक बट्टे खाते में डाला गया है। मल्लिकार्जुन खरगे के सवाल के जवाब में भी बताया गया है कि बट्टे खाते में डाले गए उधारकर्ताओं से वसूली की प्रक्रिया चलती रहती है। बट्टे खाते में डालने से उधारकर्ता को लाभ नहीं होता है।

इसके अलावा इस मामले में आरबीआई ने फरवरी, 2016 में एक स्पष्टीकरण जारी किया थ। उस समय रघुराम राजन आरबीआई प्रमुख थे। इसमें लोन राईट ऑफ करने और माफ करने के बीच के अंतर को स्पष्ट किया था।

बिजनस स्टैंडर्ड और दैनिक जागरण की 23 फरवरी 2022 को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक ‘सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी देते हुए बताया कि बैंकों ने भगोड़े कारोबारी विजय माल्या, नीवर मोदी और मेहुल चौकसी से 18,000 करोड़ रुपये की वसूली हो चुकी है।

मोदी सरकार ने एनपीए (NPA) की समस्याओं का समाधान करने के लिए एक कदम उठाया और इंसॉल्वेंसी और बैंकरप्ट्सी कोड (IBC) लाई। इस नियम के तहत, अगर कोई कंपनी अपने कर्जदारों को चुकाने में सक्षम नहीं है, तो उसे आईबीसी के तहत दिवालिया (अदालती प्रक्रिया) कर दिया जाता है। इसके लिए NCLT की विशेष टीम कंपनी के साथ समाधान करती है और कंपनी के मैनेजमेंट की सहमति के बाद उसे दिवालिया कर दिया जाता है। इसके बाद, उसकी सम्पत्ति पर बैंक का कब्जा होता है और बैंक उस सम्पत्ति को किसी अन्य कंपनी को बेचकर अपना कर्ज वसूल सकता है।

निष्कर्ष: मोदी सरकार द्वारा उद्योगपतियों के 14 लाख 56 हजार 226 करोड़ के कर्ज माफी के दावे को गलत साबित किया जा रहा है। उद्योगपतियों का कर्ज को बट्टे खाते में डाला जाना का मतलब यह नहीं है कि कर्ज माफी हो गई है।

दावापत्रकार दिबंग ने दावा किया है कि बैंक ने पिछले नौ वर्षों में 14 लाख 56 हज़ार दो सौ चाबीस करोड़ रुपये का ऋण उद्योगपतियों का माफ़ कर दिया है।
दावेदार दिबांग और कृष्ण कांत
फैक्ट चेकभ्रामक

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